Poems from India
Saturday, May 24, 2008
एक गुजारिश
हमसे ये खाता हो गई के दिल दे दिया तुमका
ए खाता कराने वाले, सज़ा को टू बख्श दो
नीं चुरा के मेरी, मुझे यूँ न सताओ
ऐ दिन को जगाने वाले रातों को टू बख्श दो
दफन करके मेरे अरमान दिल को लोटा दो
ऐ दिल चुरानेवाले जान को टू बख्श दो
दिल मी चुप के रखेगे दिए तुने वो हर जख्म को
ऐ जख्म देने वाले , नश्तर को टू बख्श दो
.... हिंद्कवि
ए खाता कराने वाले, सज़ा को टू बख्श दो
नीं चुरा के मेरी, मुझे यूँ न सताओ
ऐ दिन को जगाने वाले रातों को टू बख्श दो
दफन करके मेरे अरमान दिल को लोटा दो
ऐ दिल चुरानेवाले जान को टू बख्श दो
दिल मी चुप के रखेगे दिए तुने वो हर जख्म को
ऐ जख्म देने वाले , नश्तर को टू बख्श दो
.... हिंद्कवि
Labels: hindi/Urdu, hindkavi, OS2i, poem

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