Poems from India
Saturday, May 24, 2008
गर ये होता
उस खुदा की खुदाई मी यकीन नही हमको,
फिर सोचा के गर यकीं किया होता
उसके के इन्साफ को हर हाल मी सराय होता
हर गम मी उसकी सज़ा को पाया होता
अपने को तुछ, उसको मैं भगवन पाया होता
उसके लिए इंसान की बलि मैं चढा आया होता
कुछ भी करने से न हिचकिचाया होता
अपनी गलतियों पे उसकी मरजी का चोला मैं चड़ा आया होता
गुन्हा कर कशी या काबा मैं श्रद्धा से हो आया होता
हर हाल मी उसके मस्हले को पाया होता
न मैं सोचता, न मैं पूछता , सिर्फ़ पूजत मैं आया होता
आपने आप मे पशुता का उथान न पाया होता
जो मैं अनहोनी को होनि समझ आया होता
---- हिंद्कवि
फिर सोचा के गर यकीं किया होता
उसके के इन्साफ को हर हाल मी सराय होता
हर गम मी उसकी सज़ा को पाया होता
अपने को तुछ, उसको मैं भगवन पाया होता
उसके लिए इंसान की बलि मैं चढा आया होता
कुछ भी करने से न हिचकिचाया होता
अपनी गलतियों पे उसकी मरजी का चोला मैं चड़ा आया होता
गुन्हा कर कशी या काबा मैं श्रद्धा से हो आया होता
हर हाल मी उसके मस्हले को पाया होता
न मैं सोचता, न मैं पूछता , सिर्फ़ पूजत मैं आया होता
आपने आप मे पशुता का उथान न पाया होता
जो मैं अनहोनी को होनि समझ आया होता
---- हिंद्कवि
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