Poems from India
Friday, May 23, 2008
अशांत सागर के टती
क्यो आज खड़ा हूँ मैं इस अशांत सागर के टती
कहाँ गई वह मेरी वृत्ति कंतको से जून्जने की
कहाँ गई वह मेरी शक्ति आकाशों को चूमने की
क्यों संतुष्टि है इतनी बड़ी के अर्थहीन लगता जीवन अभी
क्यों घटा जीत की धुन्दला गई के मोह अभी लगता नही
क्यो अर्थहीन बैठे हो भीतर मन के हे सारथी मेरे जीवन रथ के
क्या खिन्न हुए हो प्रकृति के अनंत लोभ से
या घबरा गए हो कंतको और शिखरों की चोट से
प्रदान करो जीवन रथ को गति
और दर्शा दो इच्छाओं को
यहाँ पूर्ण विराम नही, है ये विश्राम स्थली
के आज भी खड़ा हूँ इस अशांत सागर के टती
....हिंद्कवि
कहाँ गई वह मेरी वृत्ति कंतको से जून्जने की
कहाँ गई वह मेरी शक्ति आकाशों को चूमने की
क्यों संतुष्टि है इतनी बड़ी के अर्थहीन लगता जीवन अभी
क्यों घटा जीत की धुन्दला गई के मोह अभी लगता नही
क्यो अर्थहीन बैठे हो भीतर मन के हे सारथी मेरे जीवन रथ के
क्या खिन्न हुए हो प्रकृति के अनंत लोभ से
या घबरा गए हो कंतको और शिखरों की चोट से
प्रदान करो जीवन रथ को गति
और दर्शा दो इच्छाओं को
यहाँ पूर्ण विराम नही, है ये विश्राम स्थली
के आज भी खड़ा हूँ इस अशांत सागर के टती
....हिंद्कवि
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