Poems from India

Saturday, May 24, 2008

मरण गाथा

बीमार था वह पड़ा हुआ था सगे संबंधियों से घिरा हुआ था
सगे संबंधियों से घिरा हुआ था
अब मरेगा, तब मरेगा, भाई कब मरेगा,
यह सोच कर सभ अधीर हो रहे थे जब
यमराज कहीं से वहाँ पधारे तब
अब बीमार नहीं वह बेजान पड़ा था
सगे संबंधियों से घिरा हुआ था

सब चीख चीख कर रो रहे थे
वातावरण कुंठित हो रहा था
माना कोई स्पर्धा छिड़ी थी
बस निरनै करने वाला नही था

अमर है आत्मा हर कोई जानता था
पर स्वार्थ मन मे भरा हुआ था
टूटा सहारा पड़ा हुआ था
सगे संबंधियों से घिरा हुआ था

अर्थी उठ गई कुछ दिन बीते
सब कुछ सामान्य हो रहा था
के जीवन मे कुछ जोड़ गया था
सब के लिए कुछ छोड़ गया था
जो था पिता पति किसी का
आंखों से ओझल हो रहा था....

---- हिंद्कवि

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posted by Masood at 12:04 AM

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