Poems from India

Saturday, May 24, 2008

मेरा बगीचा

सुंदर से मेरी एक नगरी थी
भाई थे उनमे बहने भी थी
माता का था एक विस्तार रूप
कोमल थी उसके आँगन की धुप
बागीचे मी फूल खिले थे
भिन्न रंग के, कुछ ज्यादा, कुछ कम खिले थे
उन रंगों के होली मी बहार मुस्कुराया करती थी
अम्बर शीश जुखता था, पड़ोसी रंज किया करते थे
यह सब मेरा था, मैं था सबका
मन हर्षित, सीना गर्व से फूला करता

फिर एक दिन, वज्र गिरा, कुछ टूटा
आँख खुली, मैं नींद से जागा
बागीचे के रंग अलग थे ढंग अलग थे
फूले मी अब बल नए थे
कुछ की नज़रे झुकी हुई थी
कुछ का सीना फुला हुआ था
कुछ मी ज्वाला धधक रही थी
कुछ विवशता से सहमे हुए थे

रंगो मी अब ज़ंग छिड़ी  थी
के नई , पुरानी एक बेल हुई थी
उजाड़ना चाह था हमने जिसको
फिर सर उठाए अब घनी हुई थी

उस बेल मी बसता है एक दैत्य
एक ही रंग है उसको भाता
उस रंग से इतना है वो मोहित
हर फूल को उस रंग मे रंगना चाहता

बाग़ मी मेरे कोलाहल है
पर हल फूल के साँस मी एक कल है
उस कल को उसे फिर रचना है
जिसमे फिर एक नई किरण होगी
हर क्यारी फिर लहराएगी ,भिन्न रंगों में  इत्राएगी
स्नेह होगा हर रंग , आदर होगा हर ढंग का
टूटेंगी तो  बस नफ्रते , दिल पे चोट  नही अब होगी
फिर अम्बर शीश झुकायेगा, फिर बाहर मुस्कुराएगी
फिर एक नई किरण होगी, फिर एक नई किरण होगी।

----हिंद्कवि



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posted by Masood at 1:20 AM

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